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षटकर्म क्या है?

Written by Astro Raunak PandeyyJune 16, 2026

षटकर्म क्या है? तंत्र में षटकर्मों का रहस्य, प्रकार और उनसे बचाव के उपाय

॥ जय माँ आदेश ॥

तंत्र शास्त्र एक अत्यंत विशाल और गूढ़ ज्ञान परंपरा है। इसके अंतर्गत अनेक प्रकार की साधनाएँ, मंत्र, यंत्र और क्रियाएँ वर्णित हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण विषय है षटकर्म। बहुत से लोग षटकर्म को सीधे-सीधे ब्लैक मैजिक मान लेते हैं, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है।

किसी भी शक्ति का उपयोग उसके उद्देश्य पर निर्भर करता है। जिस प्रकार एक औजार का प्रयोग निर्माण और विनाश दोनों के लिए किया जा सकता है, उसी प्रकार तांत्रिक क्रियाओं का उपयोग भी सकारात्मक अथवा नकारात्मक उद्देश्य से किया जा सकता है।


षटकर्म क्या है?

तंत्र शास्त्र में वर्णित छह प्रमुख क्रियाओं को सामूहिक रूप से षटकर्म कहा जाता है। इनका उपयोग विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। परंपरागत रूप से षटकर्म के छह अंग बताए गए हैं:

  • वशीकरण

  • सम्मोहन

  • उच्चाटन

  • विध्वेषण

  • स्तंभन

  • मारण

इन सभी क्रियाओं का उद्देश्य अलग-अलग होता है और इनके प्रभावों को लेकर विभिन्न तांत्रिक परंपराओं में अलग-अलग मत पाए जाते हैं।


1. वशीकरण क्या है?

वशीकरण का शाब्दिक अर्थ है किसी व्यक्ति के मन को प्रभावित करना या उसे अपनी बात मानने के लिए प्रेरित करना। तांत्रिक परंपराओं में इसे आकर्षण और प्रभाव से संबंधित क्रिया माना जाता है।

विशेषताएँ:

  • आकर्षण

  • प्रभाव

  • संवाद

  • व्यक्तित्व

  • मनोबल

संभावित लाभ:

  • आत्मविश्वास

  • प्रभावशीलता

  • लोकप्रियता

  • संप्रेषण

  • सम्मान


2. सम्मोहन क्या है?

सम्मोहन को वशीकरण का विस्तृत स्वरूप माना जाता है। इसका संबंध व्यक्ति के आकर्षण, व्यक्तित्व और सामूहिक प्रभाव क्षमता से जोड़ा जाता है।

विशेषताएँ:

  • आकर्षण

  • प्रभाव

  • व्यक्तित्व

  • संप्रेषण

  • ऊर्जा

संभावित लाभ:

  • लोकप्रियता

  • आत्मविश्वास

  • सामाजिक प्रभाव

  • संवाद क्षमता

  • प्रतिष्ठा


3. उच्चाटन क्या है?

उच्चाटन का अर्थ किसी व्यक्ति का मन किसी स्थान, वस्तु या व्यक्ति से हटाना माना जाता है। तांत्रिक ग्रंथों में इसे विशेष उद्देश्य वाली क्रिया के रूप में वर्णित किया गया है।

विशेषताएँ:

  • परिवर्तन

  • विच्छेदन

  • प्रभाव

  • नियंत्रण

  • दिशा

संभावित लाभ:

  • स्पष्टता

  • निर्णयशक्ति

  • मानसिक संतुलन

  • नई शुरुआत

  • जागरूकता


4. विध्वेषण क्या है?

विध्वेषण का संबंध दो व्यक्तियों या समूहों के बीच मतभेद उत्पन्न करने वाली क्रियाओं से जोड़ा जाता है। इसे सामान्यतः नकारात्मक उद्देश्य की क्रिया माना गया है।

विशेषताएँ:

  • प्रभाव

  • विभाजन

  • हस्तक्षेप

  • नियंत्रण

  • परिवर्तन

संभावित लाभ:

  • विवेक

  • जागरूकता

  • सुरक्षा

  • सावधानी

  • समझ


5. स्तंभन क्या है?

स्तंभन का अर्थ है किसी कार्य, स्थिति या प्रभाव को रोक देना अथवा स्थिर कर देना। तांत्रिक दृष्टि से इसका सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार से वर्णन मिलता है।

विशेषताएँ:

  • स्थिरता

  • नियंत्रण

  • संरक्षण

  • रोकथाम

  • अनुशासन

संभावित लाभ:

  • संतुलन

  • सुरक्षा

  • स्थिरता

  • संरक्षण

  • नियंत्रण


6. मारण क्या है?

मारण को षटकर्मों में सबसे उग्र और विवादास्पद क्रिया माना गया है। तांत्रिक परंपराओं में इसका उल्लेख मिलता है, किन्तु इसे अत्यंत गंभीर और दुष्परिणामकारी कर्म माना गया है।

विशेषताएँ:

  • उग्रता

  • शक्ति

  • नियंत्रण

  • प्रभाव

  • संकल्प

संभावित लाभ:

  • आत्मचिंतन

  • जागरूकता

  • सावधानी

  • विवेक

  • आध्यात्मिक समझ


षटकर्मों से बचाव के पारंपरिक उपाय

भारतीय परंपरा में नकारात्मक प्रभावों से बचाव हेतु अनेक आध्यात्मिक उपाय बताए गए हैं। सामान्य रूप से निम्न उपायों को लाभकारी माना जाता है:

  • नियमित ईश्वर उपासना

  • हनुमान चालीसा का पाठ

  • गुरु मंत्र का जप

  • सात्विक जीवनशैली

  • सकारात्मक संगति

  • घर की नियमित शुद्धि

  • ध्यान और साधना

इन उपायों का उद्देश्य व्यक्ति के मानसिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक संतुलन को मजबूत करना है।


महत्वपूर्ण सूचना

यह लेख केवल आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी प्रकार की तांत्रिक सिद्धि, चमत्कार या परिणाम की कोई गारंटी नहीं दी जाती। साधना का वास्तविक आधार श्रद्धा, सदाचार, आत्मअनुशासन और आध्यात्मिक विकास है।


निष्कर्ष

षटकर्म तंत्र शास्त्र का एक प्राचीन और जटिल विषय है, जिसके बारे में अनेक धारणाएँ और मान्यताएँ प्रचलित हैं। इनके वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए संतुलित दृष्टिकोण, शास्त्रीय अध्ययन और विवेकपूर्ण विचार आवश्यक है। आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ते समय सदैव सकारात्मकता, नैतिकता और आत्म-विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए।

॥ जय माँ आदेश ॥

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