Ameer Log Puja Mein Kya Alag Karte Hain — Sankalp, Kuldevi Aur Tantra Ka Pura Sach

॥ जय माँ आदेश ॥
शीर्षक: धन, तंत्र और संकल्प — अमीर लोग क्या अलग करते हैं अपनी पूजा में?
॥ प्रस्तावना ॥
हम अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं — यह धर्म का स्वभाव है। जब हम किसी का आदर करते हैं, तो वे हमें कुछ न कुछ लौटाते अवश्य हैं। ठीक इसी प्रकार, जब हम किसी देवी-देवता की उपासना करते हैं, तो वे भी हम पर कृपा करने के लिए विवश हो जाते हैं।
किंतु यह कृपा किस रूप में आती है? क्या माँ लक्ष्मी सीधे आपके आँगन में सोना बरसाएँगी? नहीं। माँ लक्ष्मी आपको अवसर देती हैं — एक विचार, एक प्रेरणा, एक दिशा। और उस दिशा में चलना आपका कर्तव्य है।
आज हम जानेंगे कि धनवान लोग अपनी पूजा-पाठ में क्या विशेष करते हैं, संकल्प की सही विधि क्या है, और तंत्र का सच्चा अर्थ क्या होता है।
॥ अध्याय १ — अमीर लोगों की पूजा के लक्षण ॥
जो व्यक्ति सच में धनवान होते हैं, उनकी एक विशेषता होती है — वे किसी भी देवी-देवता के पीछे भटकते नहीं। उनका स्वभाव स्थिर होता है। वे अपना कार्य निरंतर करते रहते हैं और उनके पुरोहित, तांत्रिक उनकी ओर से उपासना करते रहते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात जो देखी गई है वह यह है — अमीर लोगों की कुलदेवी अत्यंत प्रसन्न होती हैं।
हम सामान्य मनुष्य क्या भूल करते हैं? हम अपने पितरों को, अपनी कुलदेवी को भूलकर, जो देवता "ट्रेंड में" हों, उनके पीछे भाग जाते हैं। जबकि जो देवता पहले से हमारे घर में विराजमान हैं, जो हमारे कुल की रक्षा कर रहे हैं — उनकी उपेक्षा करना अत्यंत अनुचित है।
धनवान लोग अपने पुरोहित को नियमित रूप से घर पर बुलाते हैं। वे निरंतर पितृ-पूजा, कुलदेवी की पूजा और पितृपक्ष के अनुष्ठान करते हैं। यही उनकी सच्ची आध्यात्मिक पूँजी है।
॥ अध्याय २ — कलियुग में धन ही शक्ति है ॥
सतयुग में शक्ति का अर्थ था — ज्ञान। जो सबसे अधिक शास्त्रज्ञ था, वही शक्तिशाली था।
त्रेतायुग में धर्म की प्रधानता हुई। रामजी के काल में जो धर्म के साथ था, वही बलवान था।
द्वापरयुग में श्रीकृष्ण के काल में राजनीति, अर्थशास्त्र, कूटनीति और युद्धकला — इन सबका संयोग शक्ति का आधार था।
किंतु कलियुग में शक्ति की परिभाषा केवल एक है — धन।
जितनी जल्दी यह बात मनुष्य समझ ले, उतनी जल्दी उसका कल्याण होगा। इसीलिए माँ लक्ष्मी की उपासना कलियुग में सर्वाधिक फलदायी मानी गई है। देवी-देवता आपको सीधे धन नहीं देते — वे आपको अवसर देते हैं, कौशल देते हैं, प्रेरणा देते हैं। उस प्रेरणा पर कर्म करना आपका धर्म है।
भगवान शिव के एक भक्त की कथा है जो प्रतिदिन शिवजी से लॉटरी जिताने की प्रार्थना करता था। एक दिन शिवजी प्रकट हुए और बोले — "पहले टिकट तो खरीदो।" अर्थात् देवता तभी सहायता करते हैं जब आप स्वयं भी प्रयास करते हैं।
॥ अध्याय ३ — निर्धन और धनवान के संकल्प में अंतर ॥
मान लीजिए एक निर्धन व्यक्ति और एक धनवान व्यक्ति — दोनों माँ लक्ष्मी की पूजा कर रहे हैं। दोनों ने एक थाल चावल का अर्पण किया। किंतु उनके संकल्प में जमीन-आसमान का फर्क है।
निर्धन का संकल्प: हे माँ, बस मेरा गुजारा होता रहे। महीने में एक बार परिवार के साथ बाहर जा सकूँ। खर्चे कम हों, बस इतना काफी है।
धनवान का संकल्प: हे माँ, मेरा नाम संसार के सबसे धनवान लोगों की सूची में आए।
माँ लक्ष्मी दोनों की पूजा स्वीकार करती हैं। किंतु जो जितना माँगता है, उतना ही पाता है। संकल्प जितना बड़ा, फल उतना महान।
यही है संकल्प का सूत्र — छोटी इच्छा, छोटा फल। बड़ी इच्छा, बड़ा फल।
॥ अध्याय ४ — संकल्प की सही विधि ॥
किसी भी पूजा को आरंभ करने से पूर्व एक दीपक प्रज्वलित करें। यह दीपक साक्षी है — अग्नि और जल को साक्षी मानकर संकल्प लिया जाता है।
संकल्प विधि इस प्रकार है —
पहले आसन शुद्ध करें। उस पर बैठें। स्वयं पर जल छिड़कें। अपने हाथ में चावल और जल लें। अब बोलें —
"मैं (अपना नाम), (अपना गोत्र यदि ज्ञात हो), (अपना स्थान) में बैठकर, अग्नि और जल को साक्षी मानकर यह संकल्प लेता/लेती हूँ कि मैं (अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से कहें) की प्राप्ति हेतु (देवता का नाम) का (कितने दिन/कितनी माला) जप करूँगा/करूँगी।"
संकल्प दो प्रकार के होते हैं —
निष्काम संकल्प — जिसमें कोई व्यक्तिगत इच्छा न हो, केवल ईश्वर की कृपा हेतु।
सकाम संकल्प — जिसमें कोई विशेष कामना हो, जैसे नौकरी, धन, स्वास्थ्य, विवाह आदि।
अधिकांश साधना सकाम ही होती है क्योंकि हम संसार में रहते हैं और हमारी इच्छाएँ होती हैं — यह स्वाभाविक है।
॥ अध्याय ५ — साक्षी का महत्व ॥
संकल्प में साक्षी अत्यंत आवश्यक है। जैसे किसी न्यायालय में गवाह के बिना कोई बात मान्य नहीं होती, वैसे ही देवता के दरबार में भी साक्षी चाहिए।
अग्नि और जल — ये दो सबसे पवित्र साक्षी हैं। दीपक जलाकर, हाथ में जल लेकर संकल्प बोला जाता है। इससे ब्रह्मांड को संकेत मिलता है कि आप यह साधना किस उद्देश्य से कर रहे हैं।
पूजा संपन्न होने के पश्चात पुनः चावल और जल हाथ में लेकर विसर्जन संकल्प भी लें —
"हे (देवता का नाम), मैंने जो संकल्प लिया था, वह आज पूर्ण हुआ। इस जप का संपूर्ण फल मुझे प्राप्त हो। यह जप मैं आपको अर्पण करता/करती हूँ।"
इसके पश्चात क्षमा-प्रार्थना करें कि इस पूजा में जो भी त्रुटि हुई हो, उसे देवता क्षमा करें और मेरी मनोकामना पूर्ण करें।
॥ अध्याय ६ — विभिन्न देवताओं के विभाग ॥
जिस प्रकार संसार में हर विभाग का एक अलग अधिकारी होता है, उसी प्रकार देवताओं के भी अलग-अलग विभाग हैं —
माँ लक्ष्मी — धन, समृद्धि और अवसर की देवी हैं।
माँ सरस्वती — ज्ञान, स्मृति, विद्या और मानसिक स्थिरता की देवी हैं।
भगवान शिव — मानसिक शांति, ग्रह-संतुलन और मोक्ष के देवता हैं। विद्यार्थियों के लिए शिव की उपासना अत्यंत फलदायी है।
हनुमान जी — सुरक्षा, शक्ति और पृथ्वी के समस्त कार्यों के देवता हैं।
भगवान राम — जीवन में शांति और धर्म की स्थापना के देवता हैं।
भगवान कृष्ण — जीवन को सुंदर ढंग से जीने की कला, कूटनीति और आनंद के देवता हैं।
भैरव जी — दुःख, क्रोध, दरिद्रता और दुष्ट शक्तियों के नाश के देवता हैं।
माँ काली — अज्ञान, पाप और समस्त असुर शक्तियों के विनाश की देवी हैं।
एक महत्वपूर्ण बात — देवता आपसे कुछ लेने आते हैं, देने नहीं। वे क्या लेते हैं? आपके दुःख, आपका क्रोध, आपकी पीड़ा। जैसे माँ काली ने रक्तबीज का वध किया — वे संसार का कष्ट हरने आई थीं।
॥ अध्याय ७ — सात्विक और तामसिक रक्षा-कवच ॥
सात्विक देवता की रक्षा अत्यंत पवित्र होती है। किंतु यदि आप मांस, मदिरा का सेवन करते हैं तो सात्विक देवता की रक्षा उस समय के लिए शिथिल हो सकती है।
तामसिक शक्तियों की रक्षा इन परिस्थितियों में भी अटल रहती है। और जो अघोर साधना से प्राप्त रक्षा-कवच होता है — वह सबसे अधिक अभेद्य होता है, उसे कोई तोड़ नहीं सकता।
यहाँ यह भी जानना आवश्यक है — हमारी संस्कृति में पूर्ण स्वतंत्रता है। चाहे आप सात्विक हों या तामसिक जीवन जीते हों — ईश्वर आपको स्वीकार करते हैं। माँ काली की पूजा उन लोगों के लिए भी संभव है जो मांसाहारी हैं। बस पहले भोग लगाएँ, फिर ग्रहण करें।
॥ अध्याय ८ — क्या भाग्य बदला जा सकता है? ॥
यह प्रश्न अनेक लोगों के मन में उठता है। उत्तर है — हाँ, भाग्य बदला जा सकता है।
ऋषि मार्कण्डेय की कथा इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उनके माता-पिता को शिवजी ने दो विकल्प दिए — दीर्घायु किंतु मूर्ख पुत्र, अथवा अल्पायु किंतु परम ज्ञानी पुत्र। माता-पिता ने ज्ञानी पुत्र चुना। उस ज्ञानी बालक ने शिव की ऐसी तपस्या की कि शिवजी ने उन्हें चिरायु का वरदान दे दिया।
भाग्य में जो लिखा है, वह कर्म, उपासना और गुरुकृपा से बदला जा सकता है। इसमें संदेह नहीं।
दान भी भाग्य बदलता है। जब आप किसी जरूरतमंद को उसकी आवश्यकता की वस्तु देते हैं — चाहे वह अनाज हो, वस्त्र हो या स्वर्ण — तो आप अपना कर्म सुधारते हैं। और कर्म सुधरने से भाग्य सुधरता है।
॥ अध्याय ९ — तंत्र का सच्चा अर्थ ॥
तंत्र का अर्थ काला वस्त्र पहनकर श्मशान में जाना नहीं है। तंत्र का अर्थ है — ब्रह्मांड की ऊर्जा से सरल विधि से जुड़ना।
तंत्र में मंत्र सरल होते हैं। आप अपनी भाषा में भी उपासना कर सकते हैं। पहनावे का कोई बंधन नहीं। साफ वस्त्र, स्वच्छ मन और एकाग्रता — यही तंत्र की नींव है।
कलियुग में तंत्र इसलिए सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसे हर व्यक्ति घर पर कर सकता है। न कठिन उच्चारण चाहिए, न कठोर नियम। केवल श्रद्धा, संकल्प और निरंतरता चाहिए।
॥ अध्याय १० — अंतर्ज्ञान शक्ति कैसे बढ़ाएँ ॥
अंतर्ज्ञान अर्थात् इंट्यूशन — यह शक्ति हर मनुष्य में सुप्त है। इसे जागृत किया जा सकता है।
सरल विधि इस प्रकार है —
अपने इष्टदेव का नाम लेकर आँखें बंद करें। मन में उनका नाम जपते रहें। विचार आएँगे, भटकाव होगा — यह स्वाभाविक है। किंतु बार-बार अपना ध्यान इष्टदेव के नाम पर वापस लाएँ। यह क्रिया प्रतिदिन १५ से २० मिनट करें।
सात से दस दिन के पश्चात किसी मित्र के बारे में मन में प्रश्न करें — "वे अभी कहाँ हैं? कैसे हैं?" जो उत्तर मन में पहले आए, वही सही होने की संभावना अधिक है। जाँचें। परखें। और गहरे जाएँ।
यह साधना किसी भी धर्म का व्यक्ति कर सकता है। ब्रह्मांड की शक्ति सबके लिए समान रूप से उपलब्ध है।
यदि आपके पास गुरु मंत्र है तो उस पर ध्यान केंद्रित करें — अंतर्ज्ञान शक्ति शीघ्र जागृत होगी।
॥ उपसंहार ॥
देवी-देवता हमें कभी निराश नहीं करते। वे सदैव हमारी सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम सही विधि से उनसे जुड़ें, सही संकल्प लें और निरंतर कर्म करते रहें।
याद रखें — माँ लक्ष्मी ने कभी किसी आलसी के घर को अपना निवास नहीं बनाया। प्रयास करने वाले पर ही कृपा होती है।
अपनी कुलदेवी को प्रणाम करें। पितरों का स्मरण करें। और प्रतिदिन कम से कम १५-२० मिनट अपने इष्टदेव की उपासना अवश्य करें।
जय माँ आदेश।